भारतीय शास्त्र 3



पराशर नियम

 

पराशर के दादा जी वसिष्ठ हुए और पुत्र व्यास, उस समय में दाख़िल होइये वो दौर जब विश्वामित्र और वसिष्ठ की के बीच गंभीर तनातनी चल रही थी, वसिष्ठ के 100 पुत्र मार दिए जाते हैं बस एक पौत्र पराशर बचते हैं महभारत का काल सब कुछ तबाह हो रहा है..

वसिष्ठ की परंपरा ने जितने शास्त्र बचाए जा सकते थे जितने डाटा इन्फोर्मेशन संभाल सकते थे सब दोबारा से रिस्टोर किया

आपको पता है वेद पुराण महभारत और भी बहुत कुछ कृष्ण द्वैपायन व्यास ने लिखा या जो बचाया जा सकता था इस परंपरा ने बचाया

एजुकेशन और धर्म अर्थ काम मोक्ष सम्बन्धी बहुत सी किताबें आयीं...

हिन्दू धर्म जिन नियमावली को फॉलो करता है वो पराशर की हैं, ज्योतिष की बहुत सारी परंपरा लगभग गायब हैं या उनका बहुत कम अंश मिलता है जैसे जैमिनी,भृगु, गौतम आदि


1. बृहत्पराशर होरा शास्त्र,

 

2. लघुपाराशरी (ज्यौतिष),

 

3. बृहत्पाराशरीय धर्मसंहिता,

 

4. पराशरीय धर्मसंहिता (स्मृति),

 

5. पराशर संहिता (वैद्यक),

 

6. पराशरीय पुराणम्‌ (माधवाचार्य ने उल्लेख किया है),

 

7. पराशरौदितं नीतिशास्त्रम्‌ (चाणक्य ने उल्लेख किया है),

 

8. पराशरोदितं, वास्तुशास्त्रम्‌ (विश्वकर्मा ने उल्लेख किया है)।

 

यहाँ से एक नयी या जितना बचाया जा सकता है उसको बचाते हुए स्कूल और एजुकेशन सिस्टम फॉर्म हुए..

 

फिर इसी परंपरा से निकल के लग अलग स्कूल बने..और इस परंपरा में अन्य शास्त्र जो पराशर और व्यास नहीं अन्य ऋषि परंपरा ने बचाया इसके साथ मिल के एक अलग स्कूल ऑफ़ थॉट बने..

 

 

इसके बाद पाणिनि का नाम मैं लेना चाहूँगा जिनका काल ५२०-४६० ईसा पूर्व का माना जाता है

इस से पहले का काल निर्धारण करना उसके लिए बहस करना मुझे ज़रूरी नहीं लगता..व्यर्थ की ऊर्जा लगनी है सो छोड़ रहा..

मैं अभी यह भी दिमाग नहीं लगा रहा कि किस वक़्त में कौन सी लिपि आ गयी थी क्योकि वो एक अलग बहस का हिस्सा है..

 

यास्क व् अन्य ऋषियों ने जो काम किया था.. पाणिनि ने उसको बहुत हद्द तक व्यवस्थित कर दिया..

पाणिनि प्रथम दृष्टा पूरी एजुकेशन सिस्टम को व्यवस्थित करते नज़र आतें हैं..

और यह बस व्याकरण में योगदान के लिए नहीं है व्याकरण का अर्थ अनुशासन भी है शास्त्र बगैर परिधि बगैर अनुशासन बगैर व्याकरण समझ नहीं जा सकते..उनके आगमन के बाद लुप्त हो चुकी पद्धत्ति वापस से शुरू होती है

 

जिसको समझने के लिए मैंने इसे समझने के लिए २ भागों में बांटा है

वैदिक

अवैदिक

 

अवैदिक में वो सारी परंपरा आ जाति है वैदिक स्कूल सिस्टम को नहीं फॉलो करती,

हुआ यूँ की धीरे धीरे स्कूल ने वो सारे विषय जो उन्हें उनकी समझ से उनके समाज के लिए उनकी विचारधारा को पोषित करते हुए नहीं लगे हटा दिए..

 

या उनके अलग स्कूल बने और कहा गया उतने शास्त्र पढने की ज़रुरत क्या है क्योकि जीवन अभी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहा था..

नाट्य शास्त्र को या ध्वनि शास्त्र जिनका लोक में ज़रुरत नहीं थी उनके हिसाब से गायब होती रहीं...

कुछ कुछ जगह सरक्षण मिलने के कारण बच भी गयी कुछ ग्रन्थ भी बच गए और कुछ स्कूल भी उभरते और डूबते रहे इसमें जैन और बुद्ध परंपरा के स्कूल भी शामिल है..


वैदिक परंपरा में ख़ास १८ शास्त्र को मान्यत: है

शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और अर्थशास्त्र। इन अठारहों शास्त्रों को 'अठारह विद्याएँ' भी कहते हैं।

 

आप देख रहें हैं संगीत नाट्य नृत्य काम वास्तु  आदि शास्त्र किस तरह से डी ग्रेड कर दिए गए

पर कही कही इसकी डिटेल किसी के पास मिल जाए जैसे १६००० राग रागनियाँ मानी जाती हैं पर कितनी अभी मिलती हैं या शायद अभीभी किसी के पास जानकारी हो और पब्लिक में हो ओसे बहुत से क्लासिक शास्त्र हैं जो अभी 50 सालों में अलग अलग जगह से निकलें हैं जिनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं थी अब वो हम समझ सकतें हैं या हमारे किसी काम आयेंगे की नहीं यह अलग बहस का हिस्सा है..

 

वैदिक शिक्षा विधि इसे वेदांग भी कहते हैं इसके 6 हिस्से हैं


शिक्षा, कल्प व्याकरण छन्द निरुक्त और ज्योतिष

ये स्कूल लेवल की बेसिक एजुकेशन है

इसके बाद डिटेल में शास्त्र पढ़ायें जाते हैं

 

अगले blog में हम इन 6 हिस्सों की बात करेंगे जो काफी इंट्रेस्टिंग हैं.

भारतीय शास्त्र 4


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भारतीय शास्त्र 1

किसी भी सब्जेक्ट रिलेटेड (विषय सम्बन्धी) डाटा जो प्रॉपर वे में प्रॉपर क्रम यानि इंडेक्स के साथ

कलेक्ट कर के रखा हो वो शास्त्र कहता है जैसे, भौतिकशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, प्राणिशास्त्र, अर्थशास्त्र, विद्युत्शास्त्र, वनस्पतिशास्त्र आदि। इस तरह  यह 'विज्ञान' का पर्याय है।

"विज्ञान" को भी समझते हैं विश्वसनीय ज्ञान का वह भाग है अब विश्वसनीय क्या है ? जिसे देख सुन सूंघ स्पर्श कर सके यानी आपके सेन्स यानि इन्द्रियां जिसका अनुभव कर सके वो आपके लिए विश्वसनीय होगा...
ध्यान दीजिये डेफिनेशन समय समय पे बदल भी सकती हैं पर आगे बढ़ने के लिए अपने देश काल वातावरण में उसे डिफाइन करना ज़रूरी है जैसे  मेरे लिए मेरी बीवी जो कहे वो भी विश्वसनीय हुआ :
D

खैर ! "विज्ञान" विश्वसनीय ज्ञान का वह भाग है जिसे लॉजिक यानि तर्क द्वारा कोन्सिअस माइंड द्वारा समझा जा सके...

ये परिभाषा बाद की है...पर यही अब व्यापक रूप से इस्तेमाल हो रही है..

अब कला प्रेम जीवन सम्बन्धी अन्य विषय हम विज्ञान का हिस्सा नहीं मानते जबकि मैं और मेरे जैसे कितने प्रेम में भी फिजिक्स और मैथ लगा रहे होते हैं..

 

अच्छा हम वापस से शास्त्र पर आते हैं हमने ये तो समझ लिया किसी भी विषय को सुनियोजित तरीके से क्रम्बंध संग्रहित करना शास्त्र कहलाता है..

 

शास्त्र का एक अर्थ डिसिप्लिन यानि अनुशासन भी है.....ज़िन्दगी में कुछ भी सीखना होता है तो हमको एक डिसिप्लिन फॉलो करना होता है..शास्त्र का क्रम ऐसा होता है आप जैसे जैसे आप उसमे बढ़ते जायेंगे आप उसके अनुशासन को फॉलो करते जायेंगे और अगर आप उस डिसिप्लिन को नहीं फॉलो करते और उसके अनुसार कर्म नहीं करते तो वो शास्त्र आपको समझ में नहीं आएगा..   

तुलसी बाबा सेज सकल पदारथ इहे जग माहि कर्म हीन नर पावत नाहीं.

 

शास्त्र का एक अर्थ बताते हैं की शास्त्र उस गुरु की तरह व्यवहार करते हैं जो बच्चे की ऊँगली पकड़ के उसको चलना सिखाते हैं

मतलब बहुत बेसिक abcd से बात शुरू की जाएगी फिर आपको उसके डिसिप्लिन में शामिल कर लिया जायेगा फिर आपकी गति...

 

बहुत बहुत तरह के शास्त्र भारतीय परंपरा में रहे हैं जिसे हिन्दू परंपरा कहना छोटा करके आंकना  है, इसे भारतीय परंपरा कहना उचित है क्योकि बहुत से शात्रों को हिन्दू विशेष वर्ग शास्त्र नहीं कहता क्योकि वो वेद परंपरा को फॉलो नहीं करते खैर ! हम इसको बड़े अम्ब्रेला के तौर पे समझेंगे भारत में अलग अलग विषय पे लिखे गए ग्रन्थ जिन्हें हम शास्त्र कहते हैं उनके भीतर जाने की कोशिश करेंगे कि उनमें क्या कुछ है जो अब भी हमारे काम का है और कुछ से हम उस समय के लोगों और जीवन शैली को समझ सकते हैं

 

अगले हिस्से में मैं भारत के शात्रीय एजुकेशन सिस्टम पर बात करूँगा. 

भारतीय शास्त्र 2

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भारतीय शास्त्र 2


भारत में गुरु शिष्य परंपरा रही है, और गुरुकुल सबके लिए था जो जाना चाहे जैसे राम के साथ गुह जो भील(निषाद) थे पढ़ रहे थे,   
पर समय समय पे अपवाद आयें हैं जैसे विशेष वर्ग के लिए स्कूल और ये एक ही समय में रहा है
जैसे संदीपन मुनि के यहाँ कृष्ण और सुदामा पढ़ रहे और उधर द्रोणाचार्य के स्कूल में बस केयरटेकर भीष्म की अनुमति से कोई पढ़ सकता था...जैसे द्रोणाचार्य के स्कूल में कर्ण या एकलव्य नहीं पढ़ सकते थे
एक वक़्त था जब अलग अलग ऋषि अपने आश्रम में एक एजुकेशन का सिस्टम क्रिएट करता था
यानी आप समझिए सलेबस आम तौर पे ऋषि अपने बेटे को अपने नहीं अन्य आश्रम में भेजता था अध्ययन के लिए..
और योग्य शिष्य को अलग आश्रम बना के अलग सलेबस बनाने और अलग रिसर्च करने की प्रेरणा दी जाती थी.

अनार्य पाठशाला और आर्य पाठशाला के आधार पे आप विभाजन कर सकतें हैं.
पर जो मुझे नज़र आता है आर्य एक वक़्त में जाति सूचक शब्द होगा पर समय उपरान्त ये स्टेटस सिम्बल का शब्द बन गया और ब्लड लाइन को वैसे मेंटेन नहीं किया जा सका जिसका स्वांग अभी भारत में होता है कि हम उस ऋषि कुल से हैं
नहीं मैं ये नहीं कह रहा आप उस ऋषि कुल से नहीं हैं पर आप अपने मदर साइड के ऋषि कुल को भूल गए जो उस उस और उस से सम्बंधित रहें...खैर ! इस विषय पे बात फिर कभी..

अनार्य एजुकेशन सिस्टम जिसमें द्रविण आदि जाति आती है उसमें विशेष देवता शिव का नाम आता है जैसे शिव के शिष्य नंदी कल अलग अलग शास्त्रों की रचना करना...

जिसको उस वक़्त के आर्यों की पाठशाला अस्वीकार तो कर नहीं सकतीं थीं, अपने पोलिटिकल व् निजी उद्देश्य की पूर्ती हेतु उस बड़े सलेबस में से कुछ चैप्टर लिए वो भी एडिट कर के..
इसकी झलक आपको अलग अलग जगह मिलेगी..

आम तौर पे शिष्य गुरु के साथ रहता था वही रह के शात्रों का अध्ययन करता था...पर जितना मैं समझ पाया हूँ यह बेसिक यानि स्कूल लेवल की पढाई रही है इसके बाद ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन पीएचडी रिसर्च वर्क है जिसमें कम छात्र जाते रहे हैं और उनका सिस्टम बिल्कुल अलग रहा है..
 
आपको आर्य व् अनार्य सिस्टम का मिलन देखना हो तो दत्तात्रेय के स्कूल को समझें वहां तंत्र की जटिलताओं की पढाई होती समझ कॉप्लेक्स अलोग्रिथम लाइफ जींस RNA डीएनए और यूनिवर्स को समझने की...उस स्कूल में कोई रहता नहीं

जैसे समझने के लिहाज से हम कहेंगे परशुराम जी की शुरू की एजुकेशन महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में हुई ग्रेजुएशन जमदग्नि ऋषि के यहाँ और PG कश्यप ऋषि के यहाँ हुआ और भी कई आश्रमों में वो रिसर्च पेपर लिखते रहे और शास्त्रों को ले के अपना स्कूल बना लिया..
कश्यप ने उनको गुरु दत्तात्रेय के यहाँ भेजा...
गुरु दत्तात्रेय का सिस्टम अलग था उन्होंने परशुराम जी को कुछ प्रोब्लम कुछ प्रैक्टिस करने की चीज़ दी और जाने को कहा १२ साल काम किया फिर वो दत्तात्रेय के पास हाजरी के लिए पहुंचे फिर सम इक्वेशन फिर कुछ साल की मेहनत..
अभी आप नाथ परंपरा के कुछ स्कूल में इसी परंपरा को फोलो करते देखंगे...कि गुरु कुछ अभ्यास के लिए बात कहेंगे और शिष्य निश्चित समय बाद प्रोब्लम्स ले के गुरु के पास जायेंगे..
वैसे तो उन स्कूल आदिनाथ शिव को स्कूल का प्रिंसिपल माना जाता है पर १st  टीचर यानि पहले गुरु दत्तात्रेय को माना जाता है
   
वैसे तो समय का निर्धारण करना बड़ा मुश्किल है पर समझने के दृष्टिकोण से 

१.    मनु
२.    गौतम
३.    शंख आदि मुनि
४.    पराशर मुनि

जैसे मनु के नियम और सलेबस पहले एजुकेशन सिस्टम में लागु किये गए इसे क्लासिक सतयुग कहते हैं  उसी तरह त्रेता में गौतम और द्वापर में शंख मुनि और आज के दौर में पराशर के नियम व् सलेबस

अच्छा यह पहले से तय नहीं था ये उअर बात आज के हिन्दू वीर मनु स्मृति से कोई नियम निकल के लागू करें पर वो उसी टाइम ओफ्फ्स्लेट हो गए थे गौतम मुनि का एजुकेशन सिस्टम द्वारा
शंख आदि मुनि के दौर में यानि समझिये कृष्ण का दौर बहुत कुछ ऊपर नीचे हुआ..
बहुत से किताबें पूरी की पूरी गायब हुईं...स्कूल तबाह हो रहे थे बस लड़ाइयों का दौर था...
गौतम मुनि के एजुकेशन और धर्म अर्थ काम मोक्ष के चैपर्स में फ्रीडम पे बहुत जोर था जो मनु सिस्टम में नहीं था..सो उस से बेहद सुन्दर समाज का निर्माण हुआ नए तरह के शास्त्र भी लिखे गए जैसे शिव की प्रेरणा से नंदी दावा काम शास्त्र के १००० अध्याय..

पर ऐसा स्वछंद समाज, समाज के लिए पीड़ा दायक रहा जैसे स्त्री अपनी मर्ज़ी से किसी भी पुरुष के पास जा सकती है अपनी पति को छोड़ के भी जा सकती है..आपको ऐसे समाज की झलक अथर्ववेद में मिलेगी..

अब जब श्वेतकेतु ने अपनी माँ को किसी और पुरुष के साथ जाते हुए देखा होगा तो उसपे क्या बीता होगा और उनके पिता उद्दालक ने इसपे कोई प्रश्न नहीं किया..

श्वेतकेतु ने इस पूरे सिस्टम को बदला और एजुकेशन की तमाम नयी किताब अपनी पसंद नापसंद नज़र से लिखी अध्ययन विवाह न्याय काम सम्बन्धी तमाम शास्त्र..केतु की इमेज हम एक डार्क जादुई धुंए के तौर पे भी लेते हैं केतु के बस बॉडी है जिसका सर नहीं है आप श्वेत केतु का अर्थ समझिये...
       
और इस सिस्टम के बदलाव में साथ दिया शंख मुनि ने मेरी निजी समझ से वो भी स्वछंद और स्वंत्रता के बहुत पक्षधर नहीं थे..
एक कहानी शंख और लिखित नमक २ भाई की मैंने सुनी थी लिखित ने अपने बड़े भाई शंख मुनि के आश्रम में आये और फल तोड़ के खा लिया बड़े भाई ने उन्हें चोर कहा और इतना अपराधबोध ग्रसित कर दिया की लिखत ने अपने दोनों हाँथ काट दिए..मैं तय नहीं की ये वो ही शंख हैं पर अगर हैं तो ऐसा टीचर राम राम राम !

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भारतीय शास्त्र 4

वैदिक और अवैदिक असल में कोई विभाजन नहीं है..समझने के दृष्टिकोण से हमने किया..
कुछ इसे वैदिक और लोक के नाम से विभाजन करते हैं कुछ इसे निगम और आगम के नाम से विभाजन करते हैं..
ये सारे विभाजन आगे जा के एक ही जगह मिलते दिखाई देते हैं...जैसे सारी नदियाँ समुन्दर में समां जाती हैं..
निगम के अंतर्गत वेद पुराण उपनिषद आते हैं...जिसे ज्ञान का स्रोत कहा जाता है पर ज्ञान प्राप्त करने की जो क्रिया विधि है तो आगम हुई..
आगम के लिए एक शब्द और प्रयोग किया जाता है तंत्र
व्याकरण शास्त्र के अनुसार 'तन्त्र' शब्द ‘तन्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है 'विस्तार'। शैव सिद्धान्त के ‘कायिक आगम’ में इसका अर्थ किया गया है, तन्यते विस्तार्यते ज्ञानम् अनेन्, इति तन्त्रम् (वह शास्त्र जिसके द्वारा ज्ञान का विस्तार किया जाता है)।

इस प्रकार आगम 5 भागों में विभाजित हो सकता है, 
१.    शैव आगम
२.    वैष्णव आगम
३.    शाक्त आगम
४.    बौद्ध आगम
५.    जैन आगम

बौद्ध और जैन चूँकि स्वयं को अलग धर्म की तरह मानते है सो आप इनको इस विभाजन में शामिल न करें..

इसपे हम आगे बात करेंगे जब हम तंत्र के विस्तार में जायेंगे
अब हम वापस से वहां आते है जहाँ बात छोड़ी थी..
निगम शिक्षा यानि
वैदिक शिक्षा विधि इसे वेदांग भी कहते हैं इसके 6 हिस्से हैं

शिक्षा, कल्प व्याकरण छन्द निरुक्त और ज्योतिष

शिक्षा
वेदों के स्वर, वर्ण आदि के शुद्ध उच्चारण करने की शिक्षा जिससे मिलती है, वह 'शिक्षा' है। वेदों के मंत्रों का पठन पाठन तथा उच्चारण ठीक रीति से करने की सूचना इस 'शिक्षा' से प्राप्त होती है। इस समय 'पाणिनीय शिक्षा' भारत में विशेष मननीय मानी जाती है।

स्वर, व्यंजन ये वर्ण हैं; ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत ये स्वर के उच्चारण के तीन भेद हैं। उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित ये भी स्वर के उच्चारण के भेद हैं। वर्णों के स्थान आठ हैं -

(1) जिह्वा, (2) कंठ, (3) मूर्धा , (4) जिह्वामूल, (5) दंत, (6) नासिका, (7) ओष्ठ और (8) तालु।
कण्ठः – अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः – (अ‚ क्‚ ख्‚ ग्‚ घ्‚ ड्。‚ ह्‚ : = विसर्गः )

तालुः – इचुयशानां तालुः – (इ‚ च्‚ छ्‚ ज्‚ झ्‚ ञ्‚ य्‚ श् )

मूर्धा – ऋटुरषाणां मूर्धा – (ऋ‚ ट्‚ ठ्‚ ड्‚ ढ्‚ ण्‚ र्‚ ष्)

दन्तः – लृतुलसानां दन्तः – (लृ‚ त्‚ थ्‚ द्‚ ध्‚ न्‚ ल्‚ स्)

ओष्ठः – उपूपध्मानीयानां ओष्ठौ – (उ‚ प्‚ फ्‚ ब्‚ भ्‚ म्‚ उपध्मानीय प्‚ फ्)

नासिका च – ञमड。णनानां नासिका च (ञ्‚ म्‚ ड्。‚ण्‚ न्)

कण्ठतालुः – एदैतोः कण्ठतालुः – (ए‚ एे)

कण्ठोष्ठम् – ओदौतोः कण्ठोष्ठम् – (ओ‚ औ)

दन्तोष्ठम् – वकारस्य दन्तोष्ठम् (व)

जिह्वामूलम् – जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् (जिह्वामूलीय क्‚ ख्)

नासिका – नासिकानुस्वारस्य (ं = अनुस्वारः)


इन आठ स्थानों में से यथायोग्य रीति से, जहाँ से जैसा होना चाहिए वैसा, वर्णोच्चार करने की शिक्षा यह पाणिनीय शिक्षा देती है। अत: हम इसको 'वर्णोच्चार शिक्षा' भी कह सकते हैं।

कल्पसूत्र
वेदोक्त कर्मो का विस्तारश् के साथ संपूर्ण वर्णन करने का कार्य कल्पसूत्र ग्रंथ करते हैं। ये कल्पसूत्र दो प्रकार के होते हैं। एक 'श्रौतसूत्र' हैं और दूसरे 'स्मार्तसूत्र' हैं। वेदों में जिस यज्ञयाग आदि कर्मकांड का उपदेश आया है, उनमें से किस यज्ञ में किन मंत्रों का प्रयोग करना चाहिए, किसमें कौन सा अनुष्ठान किस रीति से करना चाहिए, इत्यादि कर्मकांड की सम्पूर्ण विधि इन कल्पसूत्र ग्रंथों में कही होती है। इसलिए कर्मकांड की पद्धति जानने के लिए इन कल्पसूत्र ग्रंथों की विशेष आवश्यकता होती है। यज्ञ आगादि का ज्ञान श्रौतसूत्र से होता है और षोडश संस्कारों का ज्ञान स्मार्तसूत्र से मिलता है।

वैदिक कर्मकांड में यज्ञों का बड़ा भारी विस्तार मिलता है। और हर एक यज्ञ की विधि श्रौतसूत्र से ही देखनी होती है। इसलिए श्रौतसूत्र अनेक हुए हैं। इसी प्रकार स्मार्तसूक्त भी सोलह संस्कारों का वर्णन करते हैं, इसलिए ये भी पर्याप्त विस्तृत हैं। श्रौतसूत्रों में यज्ञयाग के सब नियम मिलेंगे और स्मार्तसूत्रों में अर्थात्‌ गृह्यसूत्रों में उपनयन, जातकर्म, विवाह, गर्भाधान, आदि षोडश संस्कारों का विधि विधान रहेगा।

व्याकरण वेदों के ज्ञान के लिए जिन छः वेदांगों का विवेचन किया गया है उनमें व्याकरण भी महत्त्वपूर्ण वेदांग है। शब्दों व धातु रूपों आदि की शुद्धता पर व्याकरण में विचार किया जाता है। व्याकरण का अर्थ- व्याकरण शब्द का अर्थ अनेक रूपों में प्राप्त होता है- (क) व्याकरण का व्युत्पत्तिगत अर्थ है- व्याक्रियन्ते शब्दा अनेन इति व्याकरणम् (ख) आचार्य सायण के शब्दों में व्याकरणमपि प्रकृति-प्रत्ययादि-उपदेशेन पदस्वरूपं तदर्थं निश्चयाय प्रसज्यते। (ग) पाणिनीय शिक्षा में व्याकरण को वेद-पुरुष का मुख कहा गया है- मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

व्याकरण के प्रयोजन

       आचार्य वररुचि ने व्याकरण के पाँच प्रयोजन बताए हैं- (1) रक्षा (2) ऊह (3) आगम (4) लघु (5) असंदेह
(1) व्याकरण का अध्ययन वेदों की रक्षा करना है। (2) ऊह का अर्थ है-कल्पना। वैदिक मन्त्रों में न तो लिंग है और न ही विभक्तियाँ। लिंगों और विभक्तियों का प्रयोग वही कर सकता है जो व्याकरण का ज्ञाता हो। (3) आगम का अर्थ है- श्रुति। श्रुति कहती है कि ब्राह्मण का कर्त्तव्य है कि वह वेदों का अध्ययन करे।

(4) लघु का अर्थ है-शीघ्र उपाय। वेदों में अनेक ऐसे शब्द हैं जिनकी जानकारी एक जीवन में सम्भव नहीं है।व्याकरण वह साधन है जिससे समस्त शास्त्रों का ज्ञान हो जाता है। (5) असंदेह का अर्थ है-संदेह न होना। संदेहों को दूर करने वाला व्याकरण होता है, क्योंकि वह शब्दों का समुचित ज्ञान करवाता है।


निरुक्त
शब्द की उत्पत्ति तथा व्युत्पत्ति कैसे हुई, यह निरुक्त बताता है। इसविषय पर यही महत्व का ग्रंथ है। यास्काचार्य जी का यह निरुक्त प्रसिद्ध है। इसको शब्द-व्युत्पत्ति-शास्त्र भी कह सकते हैं। वेद का यथार्थ अर्थ समझने के लिए इस निरुक्त की अत्यंत आवश्यकता है।

छंद
गायत्री, अनुष्टुप्‌, त्रिष्टुप्‌, वृहती आदि छंदों का ज्ञान होने के लिए छंद:शास्त्र की उपयोगिता है। प्रत्येक छंद के पाद कितने होते हैं और ह्रस्व दीर्घादि अक्षर प्रत्येक पाद में कैसे होने चाहिए, यह विषय इसका है।

ज्योतिष
खगोल में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि आदि ग्रह किस प्रकार गति करते हैं, सूर्य, चंद्र आदि के ग्रहण कब होंगे, अन्य तारकों की गति कैसी होती है, यह विषय ज्योतिष शास्त्र का है। वेदमंत्रों में यह नक्षत्रों का जो वर्णन है, उसे ठीक प्रकार से समझने के लिए ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान बहुत उपयोगी है।

इस प्रकार वेदांगों का ज्ञान वेद का उत्तम बोध होने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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लॉजिक का क़त्ल

इमोशनल रिएक्शन चूँकि डिक्टेटरशिप को सपोर्ट करता है इसलिए हुजूम को चार्ज़ अप किया जा रहा कि लोग इमोशनल बयानबाजी करें।
ज्याद:तर पोलटिकल पार्टी चाहती है कि आप लॉजिक से नहीं इमोशन से निर्णय लें।
पोलिटिकल बात ही क्यों किसी भी बड़ी कंपनी के विज्ञापन देखिये, सब जगह इमोशनली एडवर्टीजमेंट प्लान किया जाता  है, क्योकि इमोशनल बातों के नशे में आपकी इन्द्रियाँ जो डाटा भेजती है दिमाग का लॉजिकल पार्ट ग्रहण नहीं करता..

भारतीय पोलटिकल पार्टीयाँ सोशलिस्ट पानी से सानी ज़रूर गयीं थी पर जैसे आँख का पानी मरता है, इनका पानी भी सूख गया है, अब सब किसी बड़े ब्रांड की तरह बीहेव करतीं हैं यानी शुद्ध कैप्लोस्टिक अप्रोच...
जिसने बड़ी एजेंसी हायर करी वो बड़ा ब्रांड बनेगा..और पार्टी प्रसून पल्लवित होगी। 

लगभग किसी भी पार्टी में पूर्णतया लोकतंत्र आपको दिखता है? अभी ये नहीं सोचिये कि किसमें कम है किसमें ज्याद: ...कोई भी नहीं तो ये खुद कैसे लोकतंत्र का झंडा ले के चल सकते हैं ?

पर हमें इसी खटारा गाड़ी में से चुनाव करना है और यात्रा करनी है..जब तक एक एक कर के इसके सब पुर्जे बदल नहीं देते और गाड़ी नयी नहीं हो जाती।

कुछ साल पहले दिल्ली में एक नयी गाडी का ख्वाब देखा गया था, उस ख्वाब की तामीर में उस वक़्त के विपक्ष-गाड़ी की सशक्त भूमिका थी, लोगों ने एक नयी गाडी बनायीं पर मैंने सुना.. उसका इन्जन स्टार्ट करने से पहले, बाहरी ढांचा छोड़ इन्जन विन्जन सब पुराने लगा दिए गए।
खैर अन्य गाड़ियों ने सयुक्त प्रयास से उसे दिल्ली तक ही महदूद कर दिया गया है, जिसमें पुराने  विपक्ष की ज़ोरदार भूमिका था चुनांचे उसे मेरी बिल्ली मुझी से म्याऊं जैसा महसूस हो रहा था।   

इन दिनों लोग किसी भी आरोपी को आप गुनाहगार मान लेते हैं  मीडिया भी आरोपी नहीं अपराधी का शोर मचाती है फिर फेसबुक की अदालत में आप केस चला देते हैं  और फिर फाँसी की माँग करने लगते हैं।
आरुषी हत्याकांड में लोगों ने तो अपने दिमाग में बहुत कुछ इमैज़िन कर के लम्बे लम्बे फेसबुक पोस्ट में सजा भी दे दिया था। ये ही आप हैं और आपका स्वभाव है। आपने ऑनलाइन मौजूद सारी रिपोर्ट भी नहीं पढ़ी क्योकि पढने की परंपरा तो किसी विचारधारा में है नहीं। बस दूसरों के पढने की बात करिए कभी तो त्रिपुरा से महाभारत कालीन इन्टरनेट का बयान आता है क्योकि उन्होंने ज्ञान से भरी किताबों का ज़िक्र तो किया था लेकिन उनको एक नज़र देखा भी नहीं होगा ।
गीता के पहले अध्याय का पहला श्लोक
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय

धृतराष्ट्र बोले- हे सञ्जय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें एकत्रित, युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया ?
हाँ Present continuous tense नहीं है Past tense है, यानी लाइव टेलीकास्ट नहीं था गुरु !
क्या ले के आये थे क्या ले के जाओगे जो अक्सर कलेंडर आदि में लिखा देख लेंगे गीता सार आदि में गीत में नहीं मिलेगा। जैसे ब्रह्मांड का चक्कर लगा के आपके वाट्स एप में गिरे चाणक्य के वचन भी चाणक्य के नहीं होते, चाणक्य सेक्सिस्ट आदि ज़रूर हो सकता है पर बेवकूफी की बात नहीं करेगा इतना काश लोग समझते।

कोई भी आरोपी हो, छोटा या बड़ा, लोग क्या अब तो सरकारें भी उन्हें अपराधी ही मानती और सम्बोधित करती है।   
मुझे लगता है खान और बच्चन की फिल्म देख के बड़े हुए लोगों की अपनी ही समस्या है, ये सवाल का न जवाब देते  हैं, न जवाब तलाशतें  हैं, ये सवाल के जवाब में, सवाल करतें है और उसका जवाब आप दे दो तो फिर एक सवाल... ” हाँ मैं साइन करूँगा.....जाओ पहले उस आदमी का साइन ले के आओ जिसने मेरे बाप का साइन लिया था..पहले उस आदमी का साइन ले के आओ...जिसने मेरे माँ (अब माँ की बात के बाद तो लॉजिक की बात करने वाले को फँसी दे दो) को गाली दे के नौकरी से निकल दिया था.....” अनंत लूप...आप लगातार 120 सवालों का जवाब दे भी दो तो वो खींसे निपोर के सोल्ज़र-सोल्ज़र बोल के जीत जायेगा...

बात हार जीत की नहीं हैं जब आप लड़ते लड़ते थका हुआ महसूस करोगे, जब आप इमोशनली वीक होंगे, कोई उठ खड़ा होगा कहेगा “लोकत्रंत की यही समस्या है डिक्टेटरशिप हो जाये तो तुरंत फांसी दे दी जाती...मामला तुरन्त ख़त्म हो जाता , तो भाइयों बहनों फाँसी दी जाने चाहिए कि नहीं? तुरन्त ख़त्म होना चाहिए कि नहीं ” आप चिलाओगे “फाँसी दो फाँसी दो...ख़त्म करो ख़त्म करो ”
यूँ ही इमोशनली बहने के कारण लॉजिक का क़त्ल होता है और आप व्यवहार और तर्क से ऊपर उठ जाते हो, यहीं कोई चाहता है और आप डिक्टेटरशिप के पुतले में अनजाने में जान फूंकने लगते हो।
ध्यान से ! रास्ते के लेफ्ट और राईट डिक्टेटरशिप है मध्यममार्गी बनो यहीं डेमोक्रेसी के देवता मिलेंगे।


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आदतें भी अजीब होती हैं

जब ग्रेजुएशन कर रहा था तब लफ्ज़ लफ्ज़ जोड़ के कुछ कहना शुरू किया था, उस वक़्त  गुलज़ार के मिसरे पे एक नज़्म बाँधी थी आदतें भी अजीब होती हैं ..
उस दौर में इसे लोगों ने इतना पसंद नहीं किया होता तो शायद मैं बस इंजीनीयर ग्रेजुएट ही होता
ये 2007 के आस पास कही गयी  परफॉरमेंस पोएट्री सी है, सुन ने वालों से कहता था आदतें भी अजीब होती हैं वो हर नज़्म के बाद कहें...उस सिलसिले की 24 नज्में हाज़िर हैं...

 

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ग़ज़ल 13


जो होना था..वो होना था..
मुझे हर हाल रोना था

कहानी में लिखा था क्या
मुझे जंगल में खोना था

बदन फैला रहा था मैं..
मुझे दरिया डुबोना था

खुदा ने कुछ कहा होता
मुझे क्या क्या  संजोना था

तो आख़िर मर गया मस्तो
तमाशा ख़त्म होना था


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काल


घडी की टिक-टिक
बेसिन से बूँद बूँद
गिरने के बीच
देखो कोई है...

हिरन की उछालों के बीच
हवा से हिलते पत्ते 
या
उनके एक रंग से
दूसरे रंग में बदलने के बीच
मैंने उसे देखा है
 
लाल पीले के बीच
वो कितनों को लगता है
और कितनों को
नीले और पीले के बीच
पर वो
लाल और नीले
काले और सफेद के बीच भी
फैला हुआ है
एक ऋतु से दूसरे ऋतु के बदलने के बीच
वो क्या तो खूब दिखता है
वो
मेरी उठती गिरती पलकों के बीच भी है
यानि
मेरी आँखों के बीच
मेरे बाजुओं के बीच
और हाँ
मेरे पाँव के बीच भी वो ही है
जो सा और रे के बीच 
कितना सुन्दर लगता है
और पूरे सरगम के बीच
अलग अलग सा दिखता वो
एक ही है
सूरज चन्दा तारों की गर्दिश के बीच
मैं उसे देख पा रहा हूँ
उसे मैं अपनी हर धडकन के बीच
देखता भी हूँ
और कभी रुकता भी हूँ
वो मेरी आती और जाती साँसों के बीच
पसरा हुआ है
और धीरे धीरे फैलता जाता है
उसे मैंने
दो कांपते हुए होटों 
दो जिस्मों के बीच
महसूस किया
फिर देखा है
वो ही दो के साथ तीसरा है
वो दो को एक करता है
और कुल एक है
ये
जिसे मैं देख रहा हूँ
जो मुझे देख रहा है
वो
मैं ही तो हूँ...



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पुराने कोट से सवाल


वक़्त का दरिया कब तक बहता
मैंने उसपे बाँध बनाया
खुद को रौशन रखा मैंने
पर
कितना पानी छोड़ चुका वो
इसका अब हिसाब कहाँ है
सब कुछ मेरे काबू में है

आज फिर से उस कोट को पहना
जिसको
तुमने गिफ्ट किया था
अब भी बहुत गरम करता है
अब भी मुझ पर फबता है वो
दाग तो सारे साफ़ हो गए
रंग मगर हल्का सा डल है


जेब में मैंने हाथ जो डाला
हिना ने मेरा हाथ पकड़ कर
पोर पोर महका डाला है

कितने ड्रामें बाज़ थे हम तुम

शाम वो मैं तो भूल चुका हूँ
मैं तो सब कुछ भूल चूका हूँ
इस को अब भी याद हो तुम क्यों ?

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रो दूंगा मैं



बात पुरानी याद आ गयी
ख्व़ाब में देखा हँसता उसको
कारण क्या था भूल गया हूँ
सच में ?
हाँ भूल गया हूँ ।
शोर बहुत है भीतर बाहर
काला दरिया खींच रहा है..
रोकूँ खुद को ?
डूब मैं जाऊँ ?
चाहूँ क्या मैं, जान न पाऊँ ।
छोड़ो ये सब, हाल बताओ
क्या देखा था ?
क्या  लिक्खा है
क्या बेचैनी..
कैसी हलचल
छोड़ो यारा !
बात पलट दो..
दूर से देखो
हँसता मुझको
छू ओगे तो ..रो दूंगा मैं


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ग़ज़ल 12



याद करके मैं तुझे रोता रहा
ज़िन्दगी का ये सफऱ अच्छा रहा

हार बैठा अपनी दुनिया तुझ से फिर
रात-दिन मैं खुद से ही लड़ता रहा

रूह की तक़लीफ़ को महसूस कर
रात भर मेरा बदन रोता रहा

कौन कहता है..मुझे तू याद है
अब गज़ल में वो कहाँ लहजा रहा

सब हकीकात जानने के बावजूद
पूछतें हैं वो बता कैसा रहा

हासिल-ए-मंजि़ल हुआ मुझको ये रंज
गर्द कू-ए-यार की ढोता रहा

मर गया मस्तो भला करते हुए
और उसके साथ क्या होता रहा !

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रिहर्सल रोज़ की ये !!


मैं हर रात वहशी
होने लगता..
ये वहशत
करे बेचैन
रखे बेचैन

मैं थक कर चूर हो जाने की ख़ातिर
भगाता खुद को रहता
सुबह से शाम...

मैं दम मारूँ..
कि सो पाऊं...

न जाने चाहा क्यूं मैंने
भरूँ मैं होश से पूरे...
मगर हासील
ये रिसता होश
                ये वहशीपन...
                   तड़प मेरी..
जगाये रात भर मुझको...

इसी उलझन से मैं
                   बचने की ख़ातिर
तिरे पहलू में आ कर
लेट जाता...
करूँ ख्वाहिश
मैं सो पाऊ
मैं देखूं ख़्वाब   !
जब थक हार जाता
मिरे जी में आता !
कि थामूँ हाथ तेरा
जगा कर तुझको बोलूँ
छुपा लो यार मुझको
बचा लो यार मुझको

मगर कुछ कर न पता
बदन हरकत न करता
मैं देखूं आँख फाड़े
तभी ये ध्यान आता
मैं सिद्धार्थ नहीं क्यों ..
कि सब कुछ छोड़ कर के
निकल जाऊं
बुद्ध होने
तब उसका ध्यान आता
जो राहुल सा है बिलकुल..

मैं पत्थर दिल नहीं हूँ
कि उसको छोड़ कर के
निकल पाऊँ मैं घर से
किया कैसे था उसने
जो निकला घर से वो था
ये सब कुछ देख के
नहीं देखा था उसने ?
बड़ा जिगरा था उसमें...
या पत्थर दिल था वो फिर ?

...चलो अच्छा हुआ ये
कि व्रत को तोड़ कर के 
खायी खीर उसने
फिर बैठा ध्यान में वो
मिला था ज्ञान उसको

वगरना हश्र क्या था ..?
बहुत अफ़सोस में वो
न जी सकता..
न मर सकता..
तड़प बढ़ती ही जाती
खलिश बढ़ती ही जाती
चुभन बढ़ती ही जाती...

मैं उसको दाद दूँ क्या ?

बड़ी हिम्मत थी उसमें
कि कितना कुछ धरा था..
जिसे वो छोड़ निकला
:
तिरी जानिब भी मस्तो
कहीं कुछ कम नहीं है
तू वहशी रात भर का
मगर पत्थर नहीं है
कि सब कुछ छोड़ कर तू
कहीं कुछ पा न सकता
जो मिलना ज्ञान तुझको
जो मिलना ध्यान तुझको
वो सब भीतर मिलेगा
कभी लगता है ऐसा
यूँ जस्टीफाई करना
मिरी राहत यही है

अरे ! लो सुबह आयी..
ये ले के नींद आयी
लगी ढलने ये वहशत

मैं फिर से सो चुका हूँ...

कहानी रात की है
रिहर्सल रोज़ की ये !!


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ग़ज़ल 11



सबको गले लगाता हूँ
जाने क्यों मैं ऐसा हूँ

माँ अक्सर  ये कहती है
मैं छोटा सा बच्चा हूँ

मुद्दत बाद मिलेगा वो
पूछ न बैठे कैसा हूँ

तुमने जैसा छोड़ा था
देखो अब भी वैसा हूँ

सबके हाथों खर्च हुआ
क्या  मैं रुपया-पैसा हूँ


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फुसलौना



मैं और तुम
तुम और मैं
अपनी धुरी पे घूमते
अक्सर बदल लेते हैं किरदार
जैसे सातों रंग
घूम कर हो जाते हैं एक
वैसे ही
हिज्र ओ विसाल
होतें हैं एक

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